बिहार :- बक्सर में श्रीमद् भागवत कथा आचार्य रणधीर ओझा ने की
बिहार :- बक्सर में श्रीमद् भागवत कथा आचार्य रणधीर ओझा ने की
बिहार :-बक्सर जिले में आचार्य रणधीर ओझा कर रहे अपने प्रवचनों में मित्रता की ज्ञान श्री कृष्ण एवं सुदामा की मित्रता समाज के लिए एक मिसाल है। सुदामा के आने की खबर सुनकर श्री कृष्ण व्याकुल होकर दरवाजे की तरफ दौड़ते पानी परात को हाथ छूवो नाही नैनन के जल से पग धोए।
श्री कृष्ण अपने बाल सखा सुदामा कि आव भगत में इतने भी बिभोर हो गए। के द्वारिका के नाथ हाथ जोड़कर और रंग लिफ्ट कर जल भरे नेत्रों से सुदामा का हाल चाल पूछने लगे। उक्त बातें शहर के रामरेखा घाट स्थित रामेश्वर नाथ मंदिर में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा के सातवें दिन मामा जी महाराज के कृपा पात्र कथा वाचक आचार्य रणधीर ओझा ने कहा।
उन्होंने आगे कहा कि इस प्रसंग में हमें यह शिक्षा मिलती है। की मित्रता में कभी धन दौलत आडे नहीं आती। सः सुदामा अर्थात अपने इंद्रियों को जो दमन कर ले वही सुदामा है। सुदामा के मित्रता भगवान के साथ नहीं स्वार्थी उन्होंने कभी उनके सुख साधन या आर्थिक लाभ प्राप्त करने की कामना नहीं की। लेकिन सुदामा की पत्नी द्वारा पोटली में भेजे गए चावलों ने भगवान श्री कृष्ण से सारी हकीकत कर दी और प्रभु ने बिना मांगे सुदामा को सब कुछ प्रदान कर दिया। भागवत ज्ञान यज्ञ सातवें दिन कथा में सुदामा चरित्र का वाचन हुआ तो मौजूद श्रद्धालुओं के भाव विभोर हो गए। आचार्य श्री ने कहा की श्री कृष्ण भक्त बंसल है। सभी के दिलों में बिहार करते हैं । जरूरत है तो सिर्फ शुद्ध हृदय से उन्हें पहचानने की आवश्यकता है।
इस युग में श्री कृष्ण का कीर्तन करेगा उसके घर कलह कभी नहीं प्रवेश करेगा। मृत्यु के समय परमेश्वर का ध्यान और नाम लेने से प्रभु जीव को अपने स्वरूप में समाहित कर लेते हैं। उन्होंने बताया कि जन्म जरा और मृत्यु शरीर के धर्म है। आत्मा के नहीं आत्मा अजर अमर है। इसलिए मानव को पशु बुद्धि त्याग कर अपने मन में भगवान का स्थापना करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भगवान सुखदेव ने सातवें दिन राजा परीक्षित को कथा सुनते हुए बताया कि यह मनुष्य शरीर ज्ञान और भक्ति प्राप्त करने का साधन है। और यह सभी फलों का मूल् है। शरीर देव योग से मिला है। जो उत्तम नौका के समान है। परमात्मा का सुमिरन मन में होना चाहिए। कीर्तन करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर प्रभु को प्राप्त कर सकता है। आचार्य जी श्री ने अंत में बताया कि मनुष्य स्वयं को भगवान बनाने के बजाय प्रभु के दास बनने का प्रयास करें क्योंकि भक्ति भाव देखकर जब प्रभु में वात्सल्य जाता है तो वह सब कुछ छोड़कर अपने भक्त रूपी संतान के पास पीछे दौड़े चले जाते हैं। गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है। जबकि संत सद्भाव में जीता है। यदि संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ। संतोष सबसे बड़ा धन है। वही विशाल भंडारा के साथ कथा समाप्त हुआ।
कथा आयोजन समिति में सिद्धाश्रम विकास सेवा समिति के अध्यक्ष सत्यदेव प्रसाद, सचिव रामस्वरूप अग्रवाल, नंदलाल जायसवाल,प्रो नागेंद्र नाथ पांडे,
उपाध्यक्ष विनय कुमार, कोषाध्यक्ष बसंत कुमार, ट्रस्टी हरिशंकर गुप्ता, सहित अन्य सदस्य एवं पदाधिकारी उपस्थित है