उत्तर प्रदेश : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SP नेता आज़म खान के करीबी और पूर्व डिप्टी एसपी आले हसन को उनपर दर्ज सभी मामलों में ज़मानत दे दी है।

Uttar Pradesh Allahabad High Court

उत्तर प्रदेश : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SP नेता आज़म खान के करीबी और पूर्व डिप्टी एसपी आले हसन को उनपर दर्ज सभी मामलों में ज़मानत दे दी है।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मोहम्मद आजम खान के बेहद करीबी और राज्य पुलिस के पूर्व डिप्टी एसपी आले हसन को बड़ी राहत मिलती दिख रही है। दरअसल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पूर्व डिप्टी एसपी आले हसन के खिलाफ रामपुर में दर्ज सभी 26 मामलों में उसे जमानत दे दी है। इन मामलों में आरोप लगाया गया था कि आले हसन ने पूर्व मंत्री आजम खान के साथ मिलकर जौहर विश्वविद्यालय के लिए अवैध रूप से जमीन हथियाने में मदद की थी। 

राजस्व अधिकारी और किसानों की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर में आरोप लगाया गया कि पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान और सीओ (नगर) आले हसन खान ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के पक्ष में बैनामा कराने के लिए किसानों पर दबाव बनाया, इसके साथ ही इन्होंने झूठे मामलों में फंसाने की किसानों को धमकी भी दी थी। किसानों को एक दिन के लिए हवालात में भी डालने का भी इन पर आरोप है। 

14-15 साल की देरी से दर्ज कराए गए मामले। 

आले हसन खान की सभी 26 मामलों में दायर जमानत याचिका को शुक्रवार को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति राजबीर सिंह ने कहा, “इन सभी मामलों की एफआईआर करीब 14-15 साल देर से दर्ज कराई गई है, जिसमें कथित घटनाओं की कोई तिथि, समय या स्थान का उल्लेख नहीं है। 

अदालत ने कहा, “ऐसा कोई आरोप नहीं है कि याचिकाकर्ता के कब्जे में विवादित भूमि का कोई खंड है, आरोपी याचिकाकर्ता के पक्ष में कोई बैनामा नहीं कराया गया, साथ ही आरोपी ना तो उक्त ट्रस्ट का संस्थापक है और ना ही ट्रस्टी या सदस्य है। 

मई से जेल में बंद हैं आले हसन। 

अदालत ने आगे कहा, “यह भी दर्शाया गया है कि मुख्य सह आरोपी मोहम्मद आजम खान को पहले ही जमानत मिल चुकी है, वहीं याचिकाकर्ता सात मई, 2023 से जेल में निरुद्ध है। सभी मामलों की जांच पूरी हो चुकी है और आरोप पत्र अदालत में दाखिल किये जा चुके हैं, इसलिए, इन मामलों के गुण दोष पर कोई विचार प्रकट किए बगैर जमानत का मामला बनता है। 

इससे पूर्व, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि राजनीतिक द्वेष की वजह से कई वर्षों के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ ये एफआईआर दर्ज की गईं, याचिकाकर्ता पहले ही 30 जून, 2017 को सेवानिवृत्त हो चुका है और सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद पुलिस ने सत्तारूढ़ पार्टी के प्रभाव में दो महीने के भीतर कई मामले दर्ज किए।